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कुमाऊंनी होली

उत्तराखंड में भी कुमाऊंनी होली की खास पहचान है। दो तरीके से होली मनाई जाती है-बैठकी और खड़ी होली। बैठकी होली में रंगों का त्योहार रागों के साथ मनाया जाता है। पूरी रात इस मस्ती में गुजर जाती है और इस बीच पता नहीं चलता कि भोर कब हुई. बैठकी होली की उमंग कुमाऊंनी होली के दो रूप प्रचलित हैं-बैठकी होली और खड़ी होली. बैठकी होली यहाँ पौष माह से शुरू होकर फाल्गुन तक गाई जाती है. पौष से बसंत पंचमी तक अध्यात्मिक बसंत, पंचमी से शिवरात्रि तक अर्ध श्रृंगारिक और उसके बाद श्रृंगार रस में डूबी होलियाँ गाई जाती हैं. इनमें भक्ति, वैराग्य, विरह, कृष्ण-गोपियों की हंसी-ठिठोली, प्रेमी प्रेमिका की अनबन, देवर-भाभी की छेड़छाड़ सभी रस मिलते हैं. इस होली में वात्सल्य, श्रृंगार, भक्ति रस एक साथ मौजूद हैं. संस्कृति प्रेमी एवं युग मंच संस्था चलाने वाले जुहूर आलम कहते हैं कि बैठकी होली जैसे त्योहार को एक गरिमा देती है. होली मर्मज्ञ एवं संस्कृतिकर्मी रहे गिरीश तिवारी 'गिर्दा' कहते हैं, ‘‘बैठकी होली अपने समृद्ध लोकसंगीत की वजह से यहाँ की संस्कृति में रच बस गई है. यह लोकगीत न्योली जै...

बाखलीः पहाड़ की परंपरागत हाउसिंग कालोनी

खासकर उत्तराखंड के गांवों में घरों की लंबी श्रृंखला होती थी, जिसे बाखली (बाखई) कहा जाता है। पहाड़ में अनेक गांवों में ऐसी बाखली हैं, जिनमें सैकड़ों परिवार एक साथ रहा करते थे। आज के बदलते दौर में भी कई गांवों में ऐसी बाखली मौजूद हैं, जो सामाजिकता का संदेश देती हैं। इन्हें पहाड़ की परंपरागत हाउसिंग कालोनियां भी कहा जा सकता है। सामान्यतया घरों में बनने वाले व्यंजनों का आदान-प्रदान, एक-दूसरे के घरों में दुःख-तकलीफ तथा कामकाज में सहयोग और खासकर गांवों में रात्रि में बाघ आदि जंगली जानवरों के आने की स्थिति में घरों के भीतर-भीतर ही आने-जाने की यह व्यवस्था खासी कारगर साबित होती रही है।   इससे गांव के लोगों में आपसी संबंध भी काफी मधुर रहते हैं, क्योंकि लोग एक-दूसरे से अधिक गहराई तक जुड़े रहते हैं। इन घरों में जहां दरवाजे व खिड़कियों (द्वार-म्वाव) पर लकड़ी की नक्काशी पहाड़ की समृद्ध काष्ठ कला के दर्शन कराती है, वहीं निचली मंजिल में पशुओं के लिए गोठ, ऊपरी मंजिल में बाहरी कमरा-चाख (जहां चाख यानी अनाज पीसने के लिए हाथ से चलाई जाने वाली चक्की भी होती है), पीछे की ओर रसोई, बाहर की ओर पंछियों...

Char Dham Yatra - 2022

Char Dham Yatra   चार धाम की यात्रा शुरू हो चुकी है. अनेको लोग यात्रा के लिए अपने अपने घरो से प्रस्थान कर चुके है. कई लोगो के लिए चार धाम की यात्रा करना एक सुन्दर सपने के पुरे हो जाने जैसा है. सिर्फ भारत से ही नहीं बल्कि दुनियां के कई देशो से लोग चार धाम की यात्रा के लिए आते है. यहाँ की प्राकर्तिक सुन्दरता, प्राचीनता, और बर्फ से ढकी उत्तराखंड की पहाड़ियों के बीच बने चार धाम श्रधालुओं का मन मोह लेते है. लेकिन क्या आप जानते है चार धाम की यात्रा क्यों की जाती है? चार धाम कौन कौन से है? इन चारो धामों का निर्माण किसने करवाया? शायद कई लोग जो इन यात्रा को कर चुके है वे भी इसके इतिहास के बारे में उतना नहीं जानते. तो चलिए आज इस पोस्ट में हम आपको चार धाम  की यात्रा के बारे में बताते है. चारो धाम के नाम हिन्दू पुराणों के अनुसार बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम को चार धामों में गिना जाता है. इन धार्मिक स्थलों की यात्रा को चार धाम यात्रा कहा जाता था. लेकिन आज आप उत्तराखंड की जिस चार धाम यात्रा के बारे में जानते है असल में वह छोटी चार धाम...

Folk Dances Of Uttarakhand

उत्तराखंड के लोक जीवन में अलग ही ताल और लय है जिसकी छाप यहां के लोकगीत एवं लोकनृत्यों में साफतौर पर परिलक्षित होती है। यहां के लोकगीत नृत्य केवल मनोरंजन ही नहीं बल्कि लोक जीवन के अच्छे-बुरे अनुभवों एवं उनसे सीख लेने की प्रेरणा भी देते हैं। हालांकि आधुनिक परिवेश के समयचक्र में पहाड़ों में बहुत सारे लोकगीत नृत्य विलुप्त हो गए हैं लेकिन बचे हुए लोकगीतों और नृत्यों की अपनी विशेष पहचान है। यहां लगभग दर्जन भर लोकगीतों की विधाएं आज भी अस्तित्व में हैं जिनमें चैती गीत   चौंफला ,  चांछडी   और   झुमैलो सामूहिक रूप से किए जाने वाले गीत-नृत्य हैं। चौंफला गीत शरदकालीन त्योहारों में चांछडी और झुमैलों पहले ही शामिल थे लेकिन अब बासंती खुशी का विशेष गीत चौंफला भी इन त्योहारों में गाया जाने लगा है। झुमैंलो और चांछडी तथा चौंफला तीनों गीतों में पुरुष और महिलाओं की टोली बनाकर या एक ही घेरे में नृत्य किया जाता है। तीनों के नृत्य की शैली भिन्न है किंतु तीनों में श्रृंगार एवं भाव प्रधान होते है। थडिया गीत थडिया गीत भी इसी मौसम में गाया जाता है और ये गीत चौक तथा थडों (...

चम्पावत: आज लगभग सवा ग्यारह बजे चम्पावत

चम्पावत: आज लगभग सवा ग्यारह बजे चम्पावत से लोहाघाट की ओर जाते समय मारूती स्टीम कार संख्या यूपी-16-के-8119 के ऊपर चीड़ का पेड़ गिरने से उसमें सवार मुन्नी पाण्डेय, उम्र 54 वर्ष, पत्नी केशव दत्त पाण्डेय, निवासी छतार पुनेड़ी, चम्पावत तथा दुर्गा देवी उम्र 72 वर्ष, पत्नी स्व.प्रेमबल्लभ पाण्डेय, निवासी कनलगाव, चम्पावत की चिकित्सालय ले जाते समय मृत्यु हो गई। वाहन में सवार (चालक) विनोद चौधरी, निकट कलक्ट्रेट मामूली रूप से घायल हुए हैं। घटना चम्पावत से लगभग 3 किमी. लोहाघाट की ओर तिलोन के पास हुई। बताया जा रहा है कि कार सवार सभी लोग एक शादी समारोह में जा रहे थे  ......................................................... .viral news facebook... .................................................................

यात्रा 10 मई वर्ष 2019 को खुलेंगे श्री बदरीनाथ धाम के कपाट।

यात्रा वर्ष 2019 मई 10 को खुलेंगे श्री बदरीनाथ धाम के कपाट। नरेंद्र नगर( टिहरी):इस यात्रा वर्ष विश्व प्रसिद्ध श्री बदरीनाथ धाम के कपाट 10 मई प्रात: 4 बजकर 15 मिनट पर खुलेगे। आज बसंत पंचमी के अवसर पर नरेंद्र नगर राजदरबार में आयोजित समारोह में कपाट खुलने की तिथि का ऐलान हुआ। गाडू घड़ा (तेल कलश) यात्रा की तिथि 24 अप्रैल नियत हुई । इस अवसर पर सांसद माला राज्य लक्ष्मी शाह, राजकुमारी श्रृजा श्रीबदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति अध्यक्ष मोहन प्रसाद,रावल ईश्वरा प्रसाद नंबूदरी, धर्माधिकारी भुवन उनियाल, पं कृष्ण प्रसाद उनियाल, थपलियाल, मुख्यकार्यकारी बी.डी सिंह उप मुख्य कार्याधिकारी सुनील तिवारी,ओएसडी जनसंपर्क एएस नेगी, अधिशासी अभियंता अनिल ध्यानी,डिमरी धार्मिक पंचायत अध्यक्ष राकेश डिमरी, आशुतोष डिमरी, आदि मौजूद रहे। (विस्तृत समाचार बाद में प्रेषित किया जा रहा है) (प्रेषक मीडिया प्रभारी बी.के.टी.सी. 10 फरवरी नरेन्द्र नगर से )

valley of flowers uttarakhand

चमोली,  प्रकृति का सौंदर्य देखना हो, तो फूलों की घाटी चले आइए। उत्तराखंड के सीमांत चमोली जनपद के उच्च हिमालयी क्षेत्र में समुद्र तल से 3962 मीटर की ऊंचाई पर स्थित 87.5 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैली यह घाटी पर्यटकों के लिए कुदरत का अनुपम उपहार है। यह वही घाटी है, जिसका जिक्र रामायण और महाभारत में नंदकानन के नाम से हुआ है। लेकिन वर्तमान में इस घाटी का पता सबसे पहले वर्ष 1931 में ब्रिटिश पर्वतारोही फ्रैंक एस. स्मिथ और उनके साथी आरएल होल्डसवर्थ ने लगाया। इसकी बेइंतहां खूबसूरती से प्रभावित होकर स्मिथ 1937 में दोबारा घाटी में आए और 1938 में ‘वैली ऑफ फ्लॉवर्स’ नाम से एक किताब प्रकाशित करवाई। वर्ष 1982 में फूलों की घाटी को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। हिमाच्छादित पर्वतों से घिरी यह घाटी हर साल बर्फ पिघलने के बाद खुद-बखुद बेशुमार फूलों से भर जाती है। यहां आकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो कुदरत ने पहाड़ों के बीच फूलों का थाल सजा लिया हो। अगस्त से सितंबर के बीच तो घाटी की आभा देखते ही बनती है। प्राकृतिक रूप से समृद्ध यह घाटी लुप्तप्राय जानवरों काला भालू, हिम तेंदुआ, भूरा भालू,...